बैंकों के निजीकरण के लाभ और हानि (Advantages And Disadvantages Of Privatization Of Banks)

बैंकों के निजीकरण के लाभ और हानि (Advantages And Disadvantages Of Privatization Of Banks) के बारें में जानने आयें है तो आपका स्वागत है, दोस्तों संक्षेप में सबसे पहलें बैंकों का निजीकरण क्या है इसपर चर्चा किया जाए तो आप भलीभांति जानतें होंगे सरकार से निजी क्षेत्र में स्वामित्व, संपत्ति या व्यवसाय के हस्तांतरण को निजीकरण कहा जाता है । हाल ही में भारत सरकार ने कुछ राष्ट्रीयकृत बैंकों को निजीकरण करने के संकेत दिये है, लेकिन इसी सरकार ने वर्ष 1969 में 14 और 1980 में 6 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का निर्णय लिया था, इस निर्णय का उद्देश्य देश के आर्थिक विकास हेतु आम नागरिकों को बैंकिंग सुविधाओ से जोड़ना था जो की सफल भी रहा, लेकिन अब सरकार बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने के बजाय बैंकों का निजीकरण करना चाह रही है, आईयें जानतें है Banko Ke Nijikaran Ke Labh Aur Hani यानि बैंकों के निजीकरण के फायदें और नुकसान क्या है (What Are The Advantages And disadvantages Of Privatization Of Banks)




बैंकों के निजीकरण के लाभ और हानि (Advantages And Disadvantages Of Privatization Of Banks)
बैंकों के निजीकरण के लाभ और हानि (Advantages And Disadvantages Of Privatization Of Banks)




बैंकों के निजीकरण के लाभ (Benefits Of Privatization Of Banks)


बैंकों के निजीकरण से निम्नलिखित फायदें होगें:-


1. बैंक अपनी पूंजी स्वयं जुटाने की कोशिश करेंगे जिससे सरकार को अधिक से अधिक वित्तीय दबाव झेलना नही  परेगा ।


2. अनुशासन में वृद्धि होगी एवं प्रत्येक ग्राहकों को बैंकिंग की समुचित सुविधाएँ प्रदान किया जाएगा ।


3. बैंकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तथा ग्राहक सेवा के स्तर में वृद्धि देखी जाएगी ।


4. कर्मचारियो में लालफीताशाही कम होगी एवं सभी ग्राहकों का कार्य जल्दी से निपटारा किया जाएगा ।


5. बैंकों की लाभदायकता बढ़ेगी जिससे देश के आर्थिक विकास में गति देखने को मिलेगी ।



बैंकों के निजीकरण के हानियां (Disadvantages Of Privatization Of Banks)


बैंकों के निजीकरण से निम्नलिखित दोष उत्पन्न होगें:-


1. तानाशाही को बढ़ावा मिलने की संभावना होगी ।


2. कर्मचारियों में असंतोष पैदा होगा तथा वे खुलकर विरोध कर सकते है ।


3. सरकार के सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति सही रूप से संचालित नही किये जाएंगे ।


4. बैंक ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में कुछ बड़े घरानों तक सीमित होकर रह जाएंगे ।


5 बैंक आम लोगों को उचित मूल्यों पर ऋण देने के बजाए ऋण पर अधिक से अधिक ब्याॅज अर्जित करना चाहेगी ।


6. बैंक केवल शहरों में ही सीमित होकर रह जाएगें जिसके कारण सीमांत ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को बैंकिंग सुविधाओ से वंचित रहना पर सकता है ।


7. आम जनता को अपने अकाउंट में एक मोटी रकम के रूप में न्यूनतम राशि बनाए रखना पर सकता है ।


8. बैंक सही ढंग से संचालित ना करने के स्थिति में बंद किये जाएंगे और आम जनता का पैसा डुब सकती है ।



अतः बैंकों का इतिहास देखा जाए तो 1969 से पहले सभी बैंक निजी क्षेत्र के बैंक ही थे और उनकी कमियों को दूर करने के लिये भारत सरकार ने सरकारी क्षेत्र में लिया था, इसलिए भारत सरकार को बैंकों का निजीकरण करते समय विभिन्न पहलुओं पर अवश्य ध्यान देना चाहिए क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश में बैंकों का सम्पूर्ण निजीकरण उचित ठहराया नही जा सकता, इस देश में निजी एवं सरकारी दोनों बैंक होना आवश्यक है, वरणा इस देश में 1969 से पहलें वाली हालात पैदा हो सकते है ।



ये भी पढ़िए:-


बैंकों का निजीकरण क्या है?

बैंकों का राष्ट्रीयकरण क्या है?

बैंकों का सरकारीकरण क्या है?

भारत में कुल कितने राष्ट्रीयकृत बैंक है?

बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लाभ और हानियां

1969 में कितने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया?

1980 में कितने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया?

भारतीय स्टेट बैंक का राष्ट्रीयकरण कब किया गया?

भारतीय रिज़र्व बैंक का राष्ट्रीयकरण कब किया गया?

हरित क्रांति के बाद कितने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया?

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post